रांची। झारखंड राज्य विश्वविद्यालय संविदा शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. राकेश कुमार पाण्डेय ने राज्य सरकार पर शिक्षा और शिक्षकों के प्रति नकारात्मक रवैया अपनाने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि सरकार लगातार ‘नीड बेस्ड’ शिक्षकों की समस्याओं को अनदेखा कर रही है, जबकि इन्हीं शिक्षकों की बदौलत विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में पठन-पाठन व्यवस्था बनी हुई है।
📌 विधायक प्रदीप यादव के प्रश्न को नजरअंदाज
डॉ. पाण्डेय ने कहा कि कांग्रेस विधायक दल के नेता प्रदीप यादव ने विधानसभा में इन शिक्षकों की सेवा समायोजन और मानदेय वृद्धि का मुद्दा उठाया था, लेकिन सरकार ने गंभीरता नहीं दिखाई।
उन्होंने बताया कि मंत्री ने सिर्फ इतना कहा कि नियुक्ति प्रक्रिया में हर वर्ष के अनुभव पर एक अंक दिया जाएगा। लेकिन, समायोजन और मानदेय वृद्धि को लेकर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया।
📊 बिहार और झारखंड में बड़ा अंतर
डॉ. पाण्डेय ने बताया कि
- बिहार में पॉलिटेक्निक और इंजीनियरिंग कॉलेजों में संविदा शिक्षकों का मानदेय क्रमशः ₹88,000 और ₹85,000 है।
- वहीं, झारखंड में संविदा शिक्षकों को मात्र ₹57,700 मिलता है, जबकि उन्हें 64 कक्षाएं लेनी पड़ती हैं।
उन्होंने कहा कि यह तुलना झारखंड सरकार की उदासीनता और भेदभावपूर्ण रवैये को दर्शाती है।
❗ शिक्षकों के अधिकारों की अनदेखी
संविदा शिक्षक संघ अध्यक्ष ने कहा कि
- झारखंड में कार्यरत ‘नीड बेस्ड’ शिक्षक यूजीसी मापदंडों के अनुसार चयनित हुए हैं।
- 8 साल की सेवा के बाद भी उन्हें न तो निश्चित मानदेय मिला है और न ही महंगाई भत्ता (DA) या ईपीएफ की सुविधा।
- यह सरकार की शिक्षकों के प्रति संवेदनहीनता को स्पष्ट करता है।
✍ मुख्यमंत्री से अपील
डॉ. पाण्डेय ने मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप करने की अपील की है। उन्होंने कहा कि:
- सरकार इन शिक्षकों की सेवा को उनके अनुभव के आधार पर समायोजित करे।
- जब तक यह नहीं होता, तब तक बिहार की तर्ज पर ₹88,000 का निश्चित मानदेय प्रदान किया जाए।
- सरकार चाहे तो छात्रों से फीडबैक लेकर या औचक निरीक्षण कर शिक्षकों की योग्यता और क्षमता की पुष्टि कर सकती है।