हर साल 26 जनवरी को देश की सैन्य शक्ति, सांस्कृतिक विविधता और राज्यों की झांकियां कर्तव्य पथ पर देश-दुनिया के सामने पेश की जाती हैं, लेकिन गणतंत्र दिवस 2026 इस बार इतिहास रचने जा रहा है। आज़ादी के 77 साल के इतिहास में पहली बार भारतीय सिनेमा को गणतंत्र दिवस परेड में एक समर्पित झांकी के रूप में शामिल किया जाएगा, और इस ऐतिहासिक जिम्मेदारी को निभाएंगे देश के मशहूर फिल्ममेकर संजय लीला भंसाली।
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने भारतीय सिनेमा को राष्ट्रीय मंच पर सम्मान देने के उद्देश्य से भंसाली के साथ यह विशेष साझेदारी की है। यह झांकी भारतीय फिल्मों की भव्यता, सांस्कृतिक विरासत और वैश्विक पहचान का प्रतीक बनेगी।
कर्तव्य पथ पर दिखेगा भंसाली का सिनेमाई जादू
‘देवदास’, ‘बाजीराव मस्तानी’ और ‘पद्मावत’ जैसी फिल्मों से भारतीय सिनेमा को एक अलग पहचान देने वाले संजय लीला भंसाली अपनी खास भव्यता, संगीत और कलात्मकता के लिए जाने जाते हैं। गणतंत्र दिवस परेड में उनकी झांकी भी उसी सिग्नेचर स्टाइल में तैयार की जाएगी, जिसमें भारतीय सिनेमा के गौरवशाली सफर और उसकी आत्मा को दर्शाया जाएगा।
यह पल सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का क्षण होगा, जब सिनेमा को एक राष्ट्रीय सांस्कृतिक दूत के रूप में मंच मिलेगा।
भंसाली ही क्यों बने प्रतिनिधि?
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भारतीय संस्कृति और परंपराओं को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने में संजय लीला भंसाली का योगदान अतुलनीय रहा है। उनकी फिल्मों ने भारत की जड़ों, कला और भावनाओं को भव्यता के साथ दिखाया है।
7 राष्ट्रीय पुरस्कार और पद्मश्री सम्मान से नवाजे जा चुके भंसाली को इस ऐतिहासिक अवसर के लिए सबसे उपयुक्त चेहरा माना गया है।
‘वंदे मातरम’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ होगी परेड की थीम
गणतंत्र दिवस 2026 की परेड की थीम ‘वंदे मातरम’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ रखी गई है। इसी थीम के अनुरूप भारतीय सिनेमा की झांकी को तैयार किया जाएगा, जो देश की सांस्कृतिक शक्ति और सॉफ्ट पावर को दर्शाएगी।
भव्यता के साथ भावनाओं का मेल
भंसाली की झांकी से उम्मीद की जा रही है कि यह केवल रोशनी और रंगों का प्रदर्शन नहीं होगी, बल्कि इसमें भारत की मिट्टी, उसकी संवेदनाएं और सांस्कृतिक आत्मा भी झलकेगी।
‘खामोशी’ से लेकर ‘हीरामंडी’ तक का उनका सिनेमाई अनुभव इस झांकी को एक चलती-फिरती कला (Moving Art) का रूप देगा।
यह पहल इस बात का संकेत है कि सरकार अब भारतीय सिनेमा को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि देश की सॉफ्ट पावर के रूप में गंभीरता से देख रही है।

