झारखंड सरकार द्वारा वर्ष 2021 से दिसंबर 2025 तक वसूले गए विद्युत शुल्क को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। राज्य की पांच बिजली वितरण कंपनियों का लगभग ₹5,000 करोड़ सरकार के पास जमा है। अब इस राशि की वापसी को लेकर कंपनियां हाईकोर्ट जाने की तैयारी कर रही हैं।
जनसुनवाई में हुआ खुलासा
झारखंड राज्य विद्युत नियामक आयोग द्वारा टैरिफ वृद्धि प्रस्ताव पर आयोजित जनसुनवाई के दौरान Tata Steel Utilities and Infrastructure Services Limited (यूएसआइएल) के महाप्रबंधक वीपी सिंह ने यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि सरकार के निर्देश पर उपभोक्ताओं से वसूला गया विद्युत शुल्क सीधे सरकार के पास जमा कराया गया था।
सरकार ने लगाया था प्रतिशत आधारित शुल्क
वर्ष 2021 में जारी गजट अधिसूचना के तहत झारखंड सरकार ने घरेलू उपभोक्ताओं पर 6%, औद्योगिक हाईटेंशन (10 MVA तक) पर 8% और 10 MVA से अधिक पर 15% विद्युत शुल्क लगाया था। यह शुल्क यूनिट के बजाय बिजली बिल के कुल नेट चार्जेस पर प्रतिशत के आधार पर वसूला गया।
हाईकोर्ट ने बताया असंवैधानिक
झारखंड उच्च न्यायालय ने 5 जनवरी 2026 को अपने आदेश में संशोधित प्रावधान को असंवैधानिक करार देते हुए नेट चार्जेस पर प्रतिशत आधारित वसूली को रद्द कर दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि वसूला गया शुल्क उपभोक्ताओं को ब्याज सहित लौटाया जाए या उनके बिजली बिल में समायोजित किया जाए।
कंपनियों की दलील
बिजली वितरण कंपनियों का कहना है कि वसूली गई पूरी राशि सरकार के पास जमा है और उनके पास वापसी के लिए फंड उपलब्ध नहीं है। कंपनियों के अनुसार, उनकी कुल आय का लगभग 85% हिस्सा बिजली खरीदने में खर्च हो जाता है।
राज्य में सेवा दे रही कंपनियां — Tata Steel, JBVNL, SAIL और Damodar Valley Corporation — अब विधिक सलाह लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर करने की तैयारी कर रही हैं।
कितनी राशि दांव पर?
बताया गया कि सिर्फ सरायकेला-खरसावां जिले से लगभग ₹166 करोड़ और पूरे राज्य से करीब ₹5,000 करोड़ सरकार के पास जमा हैं।
अब यह देखना अहम होगा कि कंपनियों की याचिका पर हाईकोर्ट क्या रुख अपनाता है और उपभोक्ताओं को राशि की वापसी किस प्रक्रिया से सुनिश्चित होती है।

