Ranchi: केंद्रीय कैबिनेट के द्वारा अन्य पिछड़ा वर्ग की सूची तैयार करने का जिम्मा एक बार फिर राज्य सरकारों को सौंपने का निर्णय लिया गया है. बुधवार को केंद्रीय कैबिनेट के द्वारा इससे संबंधित संसोधन विधेयक पर सहमति भी बन गयी है. संभावना है कि संसद के चलते मानसून सत्र में इस विधेयक को सदन में लाया भी जाय. देशभर में चल रहे जतिगत जनगणना को देखते हुए इसे मोदी सरकार का मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है.
इसके बाद से झारखंड में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) जातियों का आरक्षण बढ़ाने और जातिगत जनगणना कराने को लेकर राजनीतिक सरगर्मी एकाएक बढ़ गई है. आलम यह है कि झारखंड की सभी छोटी बड़ी पार्टियां इस मामले में कूद पड़ी है. खुद को ओबीसी जातियों का मसीहा साबित करने में हर दल दूसरे से बाजी मारने की जुगत में जुट गया है. हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार के सभी दल झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस और राजद तो इसे जोर-शोर से उठा ही रहे हैं, भाजपा और सहयोगी आजसू भी इस संवेदनशील मसले पर खुद को पिछड़ने नहीं देना चाह रहे. झामुमो, कांग्रेस, आजसू सहित अन्य कुछ दलों ने जातिगत मतगणना के लिए भी दबाव बनाना शुरू कर दिया है.
राजनीतिक दलों को जातियों का अंकगणित हमेशा लुभाता रहा है. इसके पीछे मुख्य वजह समय-समय पर विभिन्न जातीय समूहों के बड़े वोट बैंक को लुभाना भी रहा है. झारखंड में अगर हम आरक्षण के प्रतिशत की बात करें तो अन्य पिछड़ी जातियों की जनसंख्या सबसे ज्यादा रहने के बावजूद इसे अन्य राज्यों की तुलना में कम आरक्षण मिल रहा है. झारखंड में ओबीसी का आरक्षण 14 प्रतिशत है, जो बिहार समेत अन्य पड़ोसी राज्यों की तुलना में कम है.
जबकि अनुसूचित जाती और अनुसूचित जनजाति को उनके जनसंख्या के हिसाब से आरक्षण का प्रतिशत तय किया गया है. झारखंड में अनुसूचित जनजाति की आबादी 26 प्रतिशत है और उन्हें आरक्षण भी 26 प्रतिशत मिल रहा है. इसी तरह अनुसूचित जाती की जनसंख्या 10 प्रतिशत है और आरक्षण का प्रतिशत भी 10 है. लेकिन अन्य पिछड़ी जाति को जनसंख्या के हिसाब से लाभ नहीं मिल रहा है.

