धनबाद: कोयलांचल एक बार फिर से बिरसा हरित ग्राम योजना के लक्ष्य से मीलों दूर रह गया। इस बार लाभुकों की कमी की जगह अत्यधिक बारिश ने इसमें अड़ंगा लगा दिया। अत्यधिक बारिश के कारण खोदे गए गड्ढों के भर जाने से प्रस्तावित लक्ष्य को पाने में अधिकारियों को असफलता का मुंह देखना पड़ा है। खुद अधिकारी इसको स्वीकार करते हूए कहते हैं कि लक्ष्य को पाने के लिए लाभुको का चयन ग्राम सभा से अनुमोदित सूची के अनुसार करा लिया गया था। इसी क्रम में लगाए जानेवाले पौधों की आपूर्ति करनेवाली एजेंसी का चयन भी हो किया जा चुका था। साथ ही गड्ढों को खोद कर उनको उपचारित कर लिया गया था। बस पौधा लगाना बाकी था कि पिछले महीने हुई जोरदार बारिश ने उनकी राह थाम ली।
उपविकास आयुक्त दशरथ चंद्र दास ने बताया कि पिछले साल की लाभुकों की कमी से सबक लेते हुए इसबार पौधारोपण की सारी तैयारी समय से काफी पहले कर ली गई थी। बात चाहे लाभुकों के चयन और पौधा की आपूर्ति करने वाले एजेंसी की हो या फिर पौधा लगाने वाले स्थल चयन से लेकर गड्ढों के खोदने और उपचारित करने की। लेकिन सामान्य से चार गुणा ज्यादा बारिश ने हमारी राह मुश्किल कर दी। दास ने बताया कि इसके लिए 768 लाभुको के 700 एकड़ जमीन पर लगभग 55000 फलदार और इमारती पौधे लगाए जाने थे। लेकिन इस बार यह आंकड़ा महज 493 एकड़ तक में पौधारोपण तक ही सिमट कर रह गया। हालांकि इसको लेकर हम हतोत्साहित नहीं है। हमने राज्य सरकार को पत्र लिख कर तय समयसीमा को संशोधित करने की गुजारिश की है। एक पखवारे का और समय मिल जाने पर लक्ष्य को पाने में सफल होने की संभावना उन्होंने जताई। दास ने बताया कि पौधे की सप्लाई के लिए कोलकाता की एजेंसी घोष नर्सरी का चयन राज्य मुख्यालय द्वारा पहले ही किया जा चुका था। इस एजेंसी को फलदार वृक्ष के लिए 74 रुपये 70 पैसे प्रति पौधे की दर से आपूर्ति के लिए वर्क आर्डर दिया गया था।
गौरतलब है कि कोरोना काल में प्रवासी मजदूरों को काम देने के लिए मुख्यमंत्री की पहल पर बिरसा हरित ग्राम योजना की शुरुआत महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी के तहत की गई थी। ताकि हर हाथ को काम और रोजगार देने के साथ पर्यावरण को सुरक्षित और हरा भरा बनाया जा सके। लेकिन यह लगातार दूसरा साल है जब जिला के संबंधित अधिकारी इस योजना को सफलतापुर्वक लागू कर लक्ष्य प्राप्त करने में विफल रहे । पिछले साल भी यह योजना मजदूरों में बीच लोकप्रिय नहीं हो पाई थी। नतीजा 78000 की जगह मात्र 1100 पौधे ही लग पाए थे।

