बिहार की सियासत दो दशक के बाद बदलने जा रही है. नीतीश कुमार का राज्यसभा में नामांकन करते ही सूब की राजनीति 360 डिग्री पर घूम गई है. जेडीयू के कार्यकर्ताओं को यह बात हजम नहीं पा रही है कि नीतीश कुमार मुख्यमंत्री पद छोड़ देंगे, लेकिन अब उनके पटना से दिल्ली की राजनीति में जाने का फैसला हो चुका है. ऐसे में बीजेपी बिहार की सियासत में पहली बार अपना मुख्यमंत्री बनाने जा रही है, लेकिन नीतीश के उत्तराधिकारी को चुनने के लिए ऐसे चेहरे की तलाश है, जो भविष्य की मजबूत इबारत लिख सके.
बीजेपी में नए मुख्यमंत्री की रेस में सम्राट चौधरी से लेकर नित्यानंद राय और दिलीप जायसवाल जैसे कई नेताओं के नाम की चर्चा है. बीजेपी को नए सीएम के लिए सिर्फ संगठन और सरकार में काम करने का अनुभव ही नहीं चाहिए बल्कि बिहार के जातीय समीकरण में फिट होने के साथ-साथ पार्टी की जड़े को भी मजबूत कर सके?
बिहार की राजनीति नीतीश कुमार के इर्द-गिर्द 2005 से सिमटी हुई है. इसके चलते ही आरजेडी सत्ता में वापसी नहीं कर सकी, लेकिन अब गेम बदल रहा है. नीतीश के पटना से दिल्ली की राजनीति में शिफ्ट हो जाने के बाद बिहार की सियासत बीजेपी के हाथ में होगी. ऐसे में देखना है कि बीजेपी किसे बिहार में नीतीश कुमार का सियासी उत्तराधिकारी चुनती है?
नीतीश कुमार की तरह मजबूत चेहरे की तलाश
बीजेपी को बिहार में अब नए मुख्यमंत्री के लिए ऐसे चेहरे की तलाश है, जिसका सियासी कद और राजनीतिक हैसियत नीतीश कुमार की तरह से हो. नीतीश कुमार ने साल 2005 में आरजेडी को सत्ता से बाहर किया तो फिर दोबारा से वापसी नहीं कर पाई. बीजेपी बिहार में नीतीश कुमार के चेहरे पर ही चुनाव लड़कर सत्ता में सहयोगी बनी रही है.
बिहार के सियासी इतिहास में बीजेपी ने अपने कई नेताओं को आगे किया, लेकिन किसी ने भी अपनी राजनीतिक पहचान और कद नीतीश जैसा नहीं बना सके. यही वजह है कि बीजेपी को अब मुख्यमंत्री पद के लिए ऐसे चेहरे की तलाश करना है, जो नीतीश कुमार की तरह सियासी जड़े जमा सके. इसके अलावा बीजेपी को राजनीतिक पहचान भी बिहार में दिला सके, क्योंकि बीजेपी के लिए एक तरह से फ्रंटियर बना रहा, एक ऐसा राज्य जिसे वह अपने दम पर नहीं जीत पाई. नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद बीजेपी को बिहार में आत्म निर्भर बनाने वाला नेता की जरूरत है.
बिहार की कास्ट पॉलिटिक्स में फिट बैठ सके?
बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा अहम भूमिका निभाते रहे हैं. पिछड़ा, अति पिछड़ा (EBC), दलित और सवर्ण मतदाताओं का संतुलन चुनावी राजनीति में निर्णायक माना जाता है. बीजेपी की छवि एक सवर्ण पार्टी की रही है, जिसके चलते ओबीसी और अतिपिछड़ी जाति के वोटों को साधने के लिए अभी तक नीतीश कुमार का सहारा लिया करती थी. अब जब बीजेपी को नीतीश कुमार के सियासी उत्तराधिकारी का चुनाव करना है तो बिहार की जाति फैक्टर भी ख्याल रखना होगा, जिसकी स्वीकार्यता सभी जातियों के बीच होगा.
बीजेपी के नया मुख्यमंत्री का चुनाव करने के लिए ऐसे नेता को चुनना है, जो बिहार के जाति फैक्टर में फीट बैठता हो. ओबीसी की संख्या सबसे ज्यादा है और फिर अतिपिछड़ी जातियां. ओबीसी 30 फीसदी, ईबीसी 35 फीसदी, दलित 19 फीसदी और सवर्ण जातियां 15 फीसदी हैं. बिहार में ओबीसी और ईबीसी मिलकर 65 फीसदी होता है. नीतीश कुमार के सहारे ओबीसी और ईबीसी दोनों को बीजेपी साधती रही है, लेकिन उसके सामने वैसे ही चेहरे की तलाश है. बिहार में अगड़ा बनाम पिछड़ा की राजनीति किसी से छिपी नहीं है.

