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    Home»Featured»आदिवासी महिला पिता की संपत्ति में समान हिस्सेदारी की हकदार- SC
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    आदिवासी महिला पिता की संपत्ति में समान हिस्सेदारी की हकदार- SC

    AdminBy AdminJuly 18, 2025No Comments4 Mins Read
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    महिला अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का एक और अहम फैसला सामने आया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आदिवासियों में भी महिलाओं का भी उत्तराधिकार में हक है. उत्तराधिकार से संबंधित विवाद में आदिवासी परिवार की महिलाओं को भी पुरुषों के समान अधिकार है. महिलाओं को उत्तराधिकार से वंचित करना अनुचित और भेदभावपूर्ण है. ये महिलाओं के समानता के अधिकार का उल्लंघन है हालांकि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम अनुसूचित जनजातियों पर लागू नहीं होता, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि आदिवासी महिलाओं को स्वतः ही उत्तराधिकार से वंचित कर दिया जाए. पीठ ने  कहा कि यह देखा जाना चाहिए कि क्या कोई प्रचलित प्रथा मौजूद है, जो पैतृक संपत्ति में महिलाओं के हिस्से के आदिवासी अधिकार को प्रतिबंधित करती है.

    उत्तराधिकार के अधिकारों से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 15 का उल्लंघन

    जस्टिस संजय करोल ने फैसला लिखते हुए कहा कि इस मामले में पक्षकार ऐसी किसी प्रथा के अस्तित्व को स्थापित नहीं कर सके, जो महिलाओं को उत्तराधिकार से वंचित करती हो. यदि ऐसी कोई प्रथा है भी तो उसे विकसित होना होगा. कानून की तरह रीति-रिवाज भी समय के बंधन में नहीं बंधे रह सकते. दूसरों को रीति-रिवाजों की शरण लेने या उनके पीछे छिपकर दूसरों को उनके अधिकार से वंचित करने की अनुमति नहीं दी जा सकती. लिंग के आधार पर उत्तराधिकार के अधिकारों से वंचित करना संविधान के अनुच्छेद 15 का उल्लंघन है, जो कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है, केवल पुरुष उत्तराधिकारियों को उत्तराधिकार की अनुमति देने का कोई औचित्य नहीं है.

    यह सिर्फ लैंगिक विभाजन और भेदभाव को बढ़ाता है- SC

    फैसले में ये भी कहा गया है कि महिलाओं के अधिकारों पर रोक लगाने वाले किसी विशिष्ट आदिवासी रिवाज या संहिताबद्ध कानून के अभाव में अदालतों को ‘न्याय, समानता और अच्छे विवेक’ का प्रयोग करना चाहिए अन्यथा महिला (या उसके) उत्तराधिकारी को संपत्ति में अधिकार देने से इनकार करना केवल लैंगिक विभाजन और भेदभाव को बढ़ाता है, जिसे कानून को दूर करना चाहिए.

    लिंग के आधार पर संपत्ति में हिस्सा देने से इनकार करना असंवैधानिक है- SC

    जस्टिस संजय करोल और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने उस मामले की सुनवाई की थी, जिसमें अपीलकर्ता, धैया नामक एक अनुसूचित जनजाति की महिला के कानूनी उत्तराधिकारी होने के नाते, उसके नाना की संपत्ति में हिस्सा मांग रहे थे हालांकि परिवार के पुरुष उत्तराधिकारियों ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि आदिवासी रिवाजों के तहत महिलाओं को उत्तराधिकार से बाहर रखा गया है, लेकिन इन दलीलों को दरकिनार करते हुए, जसिस करोल द्वारा लिखित फैसले में इस बात पर जोर दिया गया कि किसी भी निषेधात्मक प्रथा के अभाव में समानता कायम रहनी चाहिए. एक आदिवासी महिला या उसके उत्तराधिकारियों को केवल लिंग के आधार पर संपत्ति में हिस्सा देने से इनकार करना असंवैधानिक है. इसके अलावा यह पाया गया कि निचली अदालत ने विरोधी पक्ष को ऐसी विरासत पर रोक साबित करने की आवश्यकता के बजाय अपीलकर्ताओं को महिलाओं द्वारा उत्तराधिकार की अनुमति देने वाली प्रथा को साबित करने की आवश्यकता बताकर गलती की.

    बेशक ये प्रथा मौन हो, लेकिन समानता के अधिकार का उल्लंघन- SC

    धैया (आदिवासी महिला) को उसके पिता की संपत्ति में हिस्सा देने से इनकार करना, जब यह प्रथा मौन हो, उसके अपने भाइयों या उसके कानूनी उत्तराधिकारियों के अपने चचेरे भाई के साथ समानता के अधिकार का उल्लंघन होगा. अदालत ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि केवल पुरुषों को ही अपने पूर्वजों की संपत्ति पर उत्तराधिकार दिए जाने और महिलाओं को नहीं दिए जाने का कोई तर्कसंगत संबंध या उचित वर्गीकरण नहीं है. खासकर उस मामले में जहां कानून के अनुसार इस तरह का कोई निषेध प्रचलित नहीं दिखाया जा सकता. अनुच्छेद 15 (1) में कहा गया है कि राज्य किसी भी व्यक्ति के साथ धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा. यह संविधान के सामूहिक लोकाचार की ओर इशारा करता है, जो यह सुनिश्चित करता है कि महिलाओं के साथ कोई भेदभाव न हो. अदालत ने अपील को स्वीकार कर लिया और  धैया के कानूनी उत्तराधिकारी होने के नाते, संपत्ति में समान हिस्सा प्रदान किया.

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